चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी ने त्योहारों से पहले आम लोगों, किसानों और कारोबारियों की चिंता बढ़ा दी है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 20 जुलाई से 20 अगस्त 2026 के बीच औसत खुदरा कीमत ₹48.18 प्रति किलो से बढ़कर ₹55.70 प्रति किलो हो गई। कुछ बाजारों में कीमतें इससे भी ऊपर पहुंचने की खबरें हैं। सरकार ने साफ किया है कि इस तेजी के लिए सिर्फ एथेनॉल उत्पादन को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं होगा। कम घरेलू उत्पादन, मौसम से फसल को नुकसान, त्योहारों से पहले बढ़ती मांग, वैश्विक आपूर्ति में कमी और कुछ स्तर पर जमाखोरी व सट्टेबाजी को भी कीमत बढ़ने की वजह बताया गया है।
चीनी की कीमतों में इतनी तेजी क्यों आई?
चीनी की कीमतों में मौजूदा तेजी के पीछे कई वजहें एक साथ काम कर रही हैं। सरकार के मुताबिक इस साल घरेलू उत्पादन अनुमान से कम रहने, गन्ने की फसल पर मौसम के असर और अगस्त से नवंबर के बीच बढ़ने वाली त्योहारी मांग ने बाजार पर दबाव बढ़ाया है। इसके अलावा वैश्विक स्तर पर चीनी की उपलब्धता में कमी और कुछ कारोबारियों की ओर से जमाखोरी या बाजार में तेजी की उम्मीद भी कीमतों को प्रभावित कर सकती है।
क्या एथेनॉल उत्पादन की वजह से महंगी हुई चीनी?
एथेनॉल को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा इसलिए है क्योंकि चीनी उद्योग से जुड़ा गन्ना एथेनॉल बनाने में भी इस्तेमाल होता है। हालांकि केंद्र सरकार ने इस दावे को खारिज किया है कि मौजूदा तेजी मुख्य रूप से एथेनॉल के लिए चीनी डायवर्ट किए जाने की वजह से है। सरकार के अनुसार एथेनॉल के लिए डायवर्ट होने वाली चीनी का हिस्सा 2022-23 में करीब 12 फीसदी से घटकर 2025-26 में लगभग 9 फीसदी रह गया है। साथ ही देश में बनने वाले एथेनॉल का करीब तीन-चौथाई हिस्सा अब अनाज, खासकर मक्का से आता है।
चीनी उत्पादन का अनुमान क्यों घटाया गया?
सरकार की शुरुआती गणना में इस सीजन में चीनी उत्पादन करीब 343 लाख टन रहने का अनुमान लगाया गया था, लेकिन बाद में इसे घटाकर लगभग 306 लाख टन किया गया। महाराष्ट्र, कर्नाटक और गुजरात जैसे प्रमुख गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में मौसम की परिस्थितियों ने फसल पर असर डाला है। उत्पादन में कमी के कारण बाजार में उपलब्ध स्टॉक को लेकर चिंता बढ़ी, खासकर ऐसे समय में जब त्योहारों के कारण मांग बढ़ने की उम्मीद है।
त्योहारों से पहले क्यों बढ़ी चीनी की मांग?
गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे त्योहारों के दौरान मिठाइयों और दूसरे खाद्य उत्पादों में चीनी की खपत बढ़ जाती है। इसी वजह से अगस्त से नवंबर के बीच बाजार में मांग सामान्य अवधि की तुलना में अधिक रहने की उम्मीद होती है। इस बार उत्पादन और स्टॉक को लेकर पहले से बनी चिंता के बीच मांग बढ़ने की संभावना ने कीमतों पर अतिरिक्त दबाव बनाया है।
सरकार ने जमाखोरी रोकने के लिए क्या किया?
कीमतों में तेजी के बीच सरकार ने बाजार में कृत्रिम कमी रोकने के लिए स्टॉक पर निगरानी बढ़ाई है। थोक कारोबारियों के लिए स्टॉक सीमा तय की गई है और 1 सितंबर से बड़े खरीदारों तथा थोक उपभोक्ताओं को 15 दिनों की जरूरत से ज्यादा चीनी रखने की अनुमति नहीं होगी। केंद्र और राज्य की टीमें मिलों तथा गोदामों में उपलब्ध स्टॉक की निगरानी भी कर रही हैं।
सरकार ने चीनी आयात का भी लिया फैसला
घरेलू बाजार में उपलब्धता बढ़ाने के लिए सरकार ने 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क मुक्त आयात की अनुमति देने का फैसला किया है। इसका उद्देश्य बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति पहुंचाकर कीमतों पर दबाव कम करना है। सरकार का यह कदम ऐसे समय आया है जब अंतरराष्ट्रीय और घरेलू बाजार दोनों में चीनी की कीमतों को लेकर चिंता बनी हुई है।
किसानों ने भी उठाई अपने हिस्से की मांग
चीनी की कीमत बढ़ने के साथ गन्ना किसानों के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि बाजार में बढ़ी कीमत का वास्तविक फायदा उन्हें कितना मिल रहा है। महाराष्ट्र में किसानों से जुड़े प्रदर्शनकारियों ने मांग की है कि चीनी की ऊंची कीमत से मिलने वाले अतिरिक्त लाभ का उचित हिस्सा गन्ना उत्पादकों तक पहुंचना चाहिए। उनका आरोप है कि बाजार भाव बढ़ने के बावजूद किसानों की आय उसी अनुपात में नहीं बढ़ रही है।
क्या आगे सस्ती हो सकती है चीनी?
चीनी की कीमतों में राहत इस बात पर निर्भर करेगी कि आने वाले दिनों में बाजार में कितनी आपूर्ति पहुंचती है और त्योहारी मांग किस स्तर पर रहती है। सरकार की ओर से शुल्क मुक्त आयात, स्टॉक सीमा और बाजार निगरानी जैसे कदमों का असर कीमतों पर पड़ सकता है। वहीं नई फसल और घरेलू उत्पादन की स्थिति भी आगे की दिशा तय करेगी। फिलहाल सरकार का जोर त्योहारों के दौरान पर्याप्त चीनी उपलब्ध कराने और कृत्रिम कमी को रोकने पर है।
