Kapil Sibal। राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी पर तीखा राजनीतिक हमला बोला। ‘Horse Trading and Democracy’ विषय पर आयोजित एक कार्यक्रम में भाषण की शुरुआत करते हुए सिब्बल ने प्रधानमंत्री की ओर से इस्तेमाल किए गए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द पर तंज कसते हुए खुद को ही ‘दिमागी नक्सल’ कह दिया।
सिब्बल ने कहा कि उन्हें यह स्वीकार करना है कि वह ‘दिमागी नक्सल’ हैं। उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक बहस पहले से जारी है।
‘मुझे कबूल करना है, मैं दिमागी नक्सल हूं’
कार्यक्रम में अपने संबोधन की शुरुआत करते हुए कपिल सिब्बल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से इस्तेमाल किए गए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को अपने अंदाज में पलटकर जवाब दिया। उन्होंने खुद को ‘दिमागी नक्सल’ बताते हुए राजनीतिक व्यंग्य किया।
यह बयान उनके उस रुख की अगली कड़ी के तौर पर देखा जा रहा है, जिसमें वह पहले भी प्रधानमंत्री के ‘दिमागी नक्सल’ वाले बयान की आलोचना कर चुके हैं। अगस्त में सिब्बल ने कहा था कि ऐसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए, खासकर तब जब प्रधानमंत्री का संबोधन पूरी दुनिया सुन रही हो।
सिब्बल ने क्यों उठाया हॉर्स ट्रेडिंग का मुद्दा?
कार्यक्रम का मुख्य विषय Horse Trading and Democracy था। सिब्बल ने अपने संबोधन में चुनाव के बाद नेताओं की कथित खरीद-फरोख्त को लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बताया।
उन्होंने कहा कि पहले के समय में युद्ध और घोड़ों के व्यापार के संदर्भ अलग थे, लेकिन आज राजनीतिक परिस्थितियां बदल गई हैं। उनके मुताबिक अब राजनीतिक खरीद-फरोख्त का सवाल सिर्फ किसी एक दल या छोटे राजनीतिक विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध जनादेश और लोकतंत्र से है।
‘जनता किसी और को वोट देती है, सत्ता किसी और के पास चली जाती है’
सिब्बल ने आरोप लगाया कि चुनाव के बाद बहुमत जुटाने के लिए पैसे, पद या जांच से राहत जैसे कथित तरीकों का इस्तेमाल लोकतांत्रिक जनादेश को प्रभावित करता है।
उन्होंने तर्क दिया कि जनता चुनाव में जिस उम्मीदवार या दल के पक्ष में मतदान करती है, अगर बाद में राजनीतिक समीकरण बदलकर सत्ता किसी दूसरे समूह के हाथ में चली जाती है तो यह मतदाताओं के फैसले का अपमान है।
हालांकि, सिब्बल के ये आरोप राजनीतिक बयान के तौर पर सामने आए हैं और उन्होंने किसी एक ताजा मामले का नाम लेकर आरोप नहीं लगाया।
‘दिमागी नक्सल’ पर पहले भी हो चुका है विवाद
‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस संबोधन के बाद से राजनीतिक बहस चल रही है। प्रधानमंत्री ने सशस्त्र नक्सलवाद और माओवादी हिंसा के अलावा वैचारिक स्तर पर मौजूद ‘दिमागी नक्सल’ मानसिकता को लेकर भी चेतावनी दी थी। उन्होंने ऐसे लोगों की पहचान और उन्हें अलग-थलग करने की बात कही थी।
इसके बाद विपक्षी नेताओं ने इस शब्द को लेकर प्रधानमंत्री और बीजेपी पर निशाना साधा। कपिल सिब्बल भी पहले इस बयान की आलोचना कर चुके हैं।
राजनीतिक बयानबाजी के बीच बढ़ी बहस
कपिल सिब्बल का ताजा बयान ऐसे समय आया है जब ‘दिमागी नक्सल’ जैसे राजनीतिक शब्दों को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच लगातार बयानबाजी देखने को मिल रही है।
सिब्बल ने अपने भाषण में इस शब्द को लेकर प्रतिक्रिया देने के साथ-साथ राजनीतिक खरीद-फरोख्त और लोकतांत्रिक जनादेश का मुद्दा भी उठाया। उनके बयान के बाद एक बार फिर यह बहस तेज हो सकती है कि चुनाव के बाद बदलते राजनीतिक समीकरणों को किस नजरिए से देखा जाना चाहिए।
