गयाजी, 27 सितंबर। बिहार के गयाजी में पितृपक्ष के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों और विदेशों से श्रद्धालु अपने पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यताओं में गया को पितरों के श्राद्ध और पिंडदान का प्रमुख तीर्थ माना गया है।
यहां फल्गु नदी के तट पर तर्पण से शुरू होने वाले अनुष्ठान विष्णुपद मंदिर और पंचकोस क्षेत्र की पिंडवेदियों से होते हुए अक्षयवट तक पहुंचते हैं।
पितृपक्ष में गयाजी का महत्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। इस दौरान श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या से शहर के होटल, धर्मशालाओं, परिवहन, खानपान और पूजा सामग्री से जुड़े कारोबारों को भी गति मिलती है।
यही वजह है कि पितृपक्ष मेला गयाजी की धार्मिक पहचान के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था का भी अहम हिस्सा बन चुका है।
फल्गु तट से शुरू होता है पिंडदान का विधान
पितृपक्ष के दौरान गयाजी पहुंचने वाले श्रद्धालु सबसे पहले फल्गु नदी के तट पर अपने पितरों के निमित्त तर्पण करते हैं। इसके बाद विष्णुपद मंदिर में भगवान विष्णु के चरण चिह्न पर पिंड अर्पित करने की परंपरा है।

श्रद्धालु अपनी आस्था और उपलब्ध समय के अनुसार एक, पांच, सात, 15 या 17 दिनों तक रहकर विभिन्न पिंडवेदियों पर धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।
पंचकोस क्षेत्र में निर्धारित वेदियों पर कर्मकांड पूरा करने के बाद अक्षयवट वेदी पर पिंडदान के साथ अनुष्ठान का समापन किया जाता है। इसके बाद तीर्थपुरोहित गयापाल पंडा की ओर से सुफल प्रदान किया जाता है।
धार्मिक मान्यता है कि गया में पिंडदान और तर्पण करने से पूर्वजों को तृप्ति मिलती है तथा उनकी आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना पूरी होती है। इसी आस्था के कारण पितृपक्ष के दौरान यहां श्रद्धालुओं का लगातार आगमन होता है।
54 पिंडवेदियां, हर स्थल का अपना धार्मिक महत्व
गयाजी में पिंडदान की परंपरा प्राचीन मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं और किंवदंतियों में पंचकोस क्षेत्र में पहले 365 पिंडवेदियों का उल्लेख मिलता है। वर्तमान में यहां 54 पिंडवेदियां प्रमुख रूप से जानी जाती हैं।

इनमें विष्णुपद और अक्षयवट का विशेष स्थान है। विष्णुपद मंदिर गयाजी की धार्मिक पहचान का प्रमुख केंद्र है। मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु के चरण चिह्न प्रतिष्ठित हैं, जिनके दर्शन और पूजन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
मंदिर का जीर्णोद्धार इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर के समय कराया गया था। काले पत्थर से निर्मित मंदिर की स्थापत्य शैली और धार्मिक महत्व इसे गयाजी के प्रमुख तीर्थस्थलों में शामिल करते हैं।
समय के साथ बदली श्रद्धालुओं के ठहरने की व्यवस्था
पहले पितृपक्ष के दौरान गयाजी आने वाले श्रद्धालु अक्सर तीर्थपुरोहितों के आवास पर ठहरते थे। वे अलग-अलग दिनों में विभिन्न पिंडवेदियों पर जाकर श्राद्ध और पिंडदान की प्रक्रिया पूरी करते थे।
समय के साथ शहर में होटल, धर्मशालाएं और अन्य आवासन सुविधाएं बढ़ी हैं। मेले के दौरान श्रद्धालुओं की जरूरतों को देखते हुए टेंट सिटी जैसी व्यवस्थाएं भी की जाती हैं। इससे दूर-दराज से आने वाले लोगों को ठहरने के अधिक विकल्प मिलते हैं।
देश के विभिन्न राज्यों के अलावा विदेशों में रहने वाले सनातन धर्मावलंबी भी पितृपक्ष के अवसर पर गयाजी पहुंचते हैं। हवाई, रेल और सड़क मार्ग से शहर तक पहुंचने की सुविधा श्रद्धालुओं की यात्रा को सुगम बनाती है।
ऑनलाइन पिंडदान पर तीर्थपुरोहितों की आपत्ति
डिजिटल तकनीक के विस्तार के साथ ऑनलाइन पिंडदान की व्यवस्था भी सामने आई है। हालांकि, गयाजी के कई तीर्थपुरोहित इस तरीके का विरोध करते हैं।
गयापाल पुरोहितों का कहना है कि पारंपरिक धार्मिक विधान में श्रद्धालु या उनके परिजन की प्रत्यक्ष उपस्थिति का विशेष महत्व है। उनके अनुसार, गया की धरती पर स्वयं उपस्थित होकर तर्पण और पिंडदान करना ही परंपरा के अनुरूप है।
इस विषय पर धार्मिक मान्यताओं और ऑनलाइन सेवाओं को लेकर अलग-अलग विचार सामने आते रहे हैं। गयाजी के तीर्थपुरोहित पारंपरिक विधि से अनुष्ठान संपन्न कराने पर जोर देते हैं।
पितृपक्ष मेले से स्थानीय कारोबार को मिलता है सहारा
पितृपक्ष के दौरान गयाजी में श्रद्धालुओं की बढ़ती आवाजाही का असर स्थानीय बाजारों पर भी दिखाई देता है। होटल, धर्मशाला, परिवहन, खानपान, पूजा सामग्री और अन्य सेवाओं से जुड़े कारोबारियों के लिए यह अवधि महत्वपूर्ण रहती है।
गया चैंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष प्रमोद भदानी के अनुसार, पितृपक्ष मेले से शहर के विभिन्न कारोबारी क्षेत्रों को लाभ मिलता है। मेले के दौरान व्यवसाय में तेजी आने की उम्मीद रहती है।
श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए जिला प्रशासन आवासन, सुरक्षा, यातायात और अन्य व्यवस्थाओं पर काम करता है। जरूरत के अनुसार सरकारी विद्यालयों और महाविद्यालयों में भी अस्थायी आवासन की व्यवस्था की जाती है।
आस्था, परंपरा और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का संगम
फल्गु नदी में तर्पण, विष्णुपद मंदिर में पिंड अर्पण और अक्षयवट पर अनुष्ठान का समापन—गयाजी की पितृपक्ष परंपरा के प्रमुख पड़ाव हैं। इन धार्मिक स्थलों से जुड़ी मान्यताएं पीढ़ियों से श्रद्धालुओं को यहां आने के लिए प्रेरित करती रही हैं।

पितृपक्ष के दौरान गयाजी में होने वाले अनुष्ठान पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और स्मरण का प्रतीक हैं। इस अवसर पर उमड़ने वाली भीड़ शहर की धार्मिक विरासत को सामने लाती है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देती है।
गयाजी में पिंडदान की परंपरा आज भी उसी आस्था के साथ निभाई जा रही है, जिसमें परिवार अपने पूर्वजों को याद कर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।
