नेपाल में आई भीषण फ्लैश फ्लड के बाद राहत और बचाव अभियान को लेकर विदेशी मदद का मुद्दा चर्चा में रहा। शुरुआत में खबरें सामने आईं कि नेपाल ने भारत, चीन, अमेरिका समेत कई देशों की ओर से भेजी जा रही विदेशी रेस्क्यू टीमों को स्वीकार नहीं किया।
हालांकि, नेपाल सरकार ने स्पष्ट किया कि उसने अंतरराष्ट्रीय सहायता से पूरी तरह इनकार नहीं किया था। सरकार का कहना था कि शुरुआती चरण में नेपाल की अपनी सुरक्षा एजेंसियों को बचाव अभियान की जिम्मेदारी दी गई थी।
बाद में स्थिति में बदलाव आया और नेपाल ने कुछ खास क्षेत्रों में विदेशी विशेषज्ञों की मदद लेने को मंजूरी दी। खास तौर पर सुरंगों में फंसे लोगों के रेस्क्यू, डीएनए जांच और फॉरेंसिक पहचान जैसे कामों के लिए भारत, चीन, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया के विशेषज्ञों को अनुमति दी गई।
नेपाल में बाढ़ ने मचाई भारी तबाही
नेपाल में बुधवार को आई भीषण बाढ़ ने कई इलाकों को प्रभावित किया। खासकर भोतेकोशी और त्रिशूली नदी क्षेत्रों में फ्लैश फ्लड से बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ। कई सड़कें, पुल, घर और जलविद्युत परियोजनाएं प्रभावित हुईं। बड़ी संख्या में लोग मारे गए या लापता बताए गए हैं।
आपदा के बाद भारत, चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया समेत कई देशों ने नेपाल को राहत सामग्री, आर्थिक सहायता और विशेषज्ञ मदद देने की पेशकश की। भारत की ओर से राहत सामग्री की कई खेप भेजी गईं और रेस्क्यू विशेषज्ञों के साथ अन्य सहायता की भी पेशकश की गई।
आखिर नेपाल ने विदेशी रेस्क्यू टीमों से दूरी क्यों बनाई?
नेपाल सरकार ने शुरुआती दौर में अपने सुरक्षा बलों को ही राहत और बचाव अभियान में प्राथमिकता दी। सरकार के मुताबिक, नेपाल सेना, नेपाल पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों और पहाड़ी इलाकों से परिचित हैं। ऐसे में शुरुआती अभियान को स्थानीय एजेंसियों के जरिए चलाना ज्यादा प्रभावी माना गया।
इसके पीछे 2015 में आए विनाशकारी भूकंप का अनुभव भी एक बड़ी वजह माना गया। उस समय बड़ी संख्या में विदेशी रेस्क्यू टीमें नेपाल पहुंची थीं। अधिकारियों के मुताबिक, अलग-अलग टीमों के बीच समन्वय और प्रबंधन को लेकर कई चुनौतियां सामने आई थीं। इस बार नेपाल सरकार ऐसी स्थिति दोबारा पैदा नहीं करना चाहती थी।
अब किन क्षेत्रों में विदेशी मदद ली जाएगी?
स्थिति गंभीर रहने के बाद नेपाल सरकार ने सीमित विदेशी विशेषज्ञता स्वीकार करने का फैसला किया है। खासतौर पर ऐसे इलाकों में जहां विशेष तकनीकी क्षमता की जरूरत है, वहां विदेशी टीमों को काम करने की अनुमति दी जा रही है।
भारत, चीन, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया के विशेषज्ञों को सुरंगों में रेस्क्यू अभियान और डीएनए व फॉरेंसिक जांच में मदद के लिए मंजूरी दी गई है। नेपाल में कई जलविद्युत परियोजनाओं की सुरंगें बाढ़ से प्रभावित हुई हैं और वहां कई लोगों के फंसे होने की जानकारी सामने आई है।
डीएनए जांच भी इस समय महत्वपूर्ण है, क्योंकि बड़ी संख्या में शवों की पहचान करना चुनौती बना हुआ है। विदेशी विशेषज्ञों की मदद से शवों की पहचान जल्द करने और उन्हें उनके परिवारों तक पहुंचाने में सहायता मिलने की उम्मीद है।
भारत ने बढ़ाया मदद का हाथ
नेपाल के पड़ोसी देश भारत ने आपदा के बाद लगातार सहायता की पेशकश की है। भारत की ओर से राहत सामग्री भेजी गई है। इसके अलावा टूटे हुए संपर्क मार्गों को बहाल करने के लिए बेली ब्रिज और प्रीफैब्रिकेटेड ब्रिज उपलब्ध कराने की पेशकश भी की गई है।
भारत ने रेस्क्यू टीम, मेडिकल टीम और सुरंगों में बचाव कार्य के लिए विशेषज्ञ भेजने की भी पेशकश की। भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल से बातचीत कर सहायता के विभिन्न विकल्पों पर चर्चा की।
विदेशी नागरिक भी बड़ी संख्या में प्रभावित
नेपाल की इस आपदा में बड़ी संख्या में विदेशी नागरिकों के संपर्क से बाहर होने की खबर सामने आई। इनमें भारतीय, अमेरिकी, यूक्रेनी, ब्रिटिश, ऑस्ट्रेलियाई और अन्य देशों के नागरिक शामिल हैं। इसी वजह से कई देशों की सरकारों ने अपने नागरिकों की तलाश के लिए नेपाल से सहयोग मांगा।
नेपाल के विदेश मंत्रालय ने विदेशी नागरिकों से जुड़े मामलों के लिए एक Emergency Response Team भी बनाई है। इसका उद्देश्य लापता लोगों की जानकारी जुटाना, खोज-बचाव अभियान से जुड़ी सूचनाओं का समन्वय करना और प्रभावित विदेशी नागरिकों के परिवारों को जानकारी उपलब्ध कराना है।
राहत के लिए ‘वन-डोर सिस्टम’
नेपाल सरकार ने विदेशी सहायता को व्यवस्थित तरीके से पहुंचाने के लिए एक केंद्रीकृत व्यवस्था अपनाने की बात कही है। सरकार चाहती है कि आर्थिक सहायता एक निर्धारित चैनल के जरिए पहुंचे, जिससे राहत सामग्री और संसाधनों के वितरण में बेहतर समन्वय हो सके।
फिलहाल नेपाल की प्राथमिकता प्रभावित लोगों तक राहत पहुंचाना, लापता लोगों की तलाश करना और टूटे संपर्क मार्गों को बहाल करना है। विदेशी मदद को लेकर सरकार का रुख अब पहले की तुलना में अधिक सीमित लेकिन जरूरत-आधारित दिखाई दे रहा है।
